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क्या किया आज तक क्या पाया? / हरिशंकर परसाई

क्या किया आज तक क्या पाया?  हरिशंकर परसाई मैं सोच रहा, सिर पर अपार दिन, मास, वर्ष का धरे भार पल, प्रतिपल का अंबार लगा आखिर पाया तो क्या पाया? जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा जब थाप पड़ी, पग डोल उठा औरों के स्वर में स्वर भर कर अब तक गाया तो क्या गाया? सब लुटा विश्व को रंक हुआ रीता तब मेरा अंक हुआ दाता से फिर याचक बनकर कण-कण पाया तो क्या पाया? जिस ओर उठी अंगुली जग की उस ओर मुड़ी गति भी पग की जग के अंचल से बंधा हुआ खिंचता आया तो क्या आया? जो वर्तमान ने उगल दिया उसको भविष्य ने निगल लिया है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु जूठन खाया तो क्या खाया?

हमारे वेद / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

हमारे वेद  अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ अभी नर जनम की बजी भी बधाई। रही आँख सुधा बुधा अभी खोल पाई। समझ बूझ थी जिन दिनों हाथ आई। रही जब उपज की झलक ही दिखाई। कहीं की अंधेरी न थी जब कि टूटी। न थी ज्ञान सूरज किरण जब कि फूटी।1। तभी एक न्यारी कला रंग लाई। हमारे बड़ों के उरों में समाई। दिखा पंथ पारस बनी काम आई। फबी और फूली फली जगमगाई। उसी से हुआ सब जगत में उँजाला। गया मूल सारे मतों का निकाला।2। हमारे बड़े ए बड़ी सूझ वाले। हुए हैं सभी बात ही में निराले। उन्होंने सभी ढंग सुन्दर निकाले। जगत में बिछे ज्ञान के बीज डाले। उन्हीं का अछूता वचन लोक न्यारा। गया वेद के नाम से है पुकारा।3। विचारों भरे वेद ए हैं हमारे। सराहे सभी भाव के हैं सहारे। बड़े दिव्य हैं, हैं बड़े पूत, न्यारे। मनो स्वर्ग से वे गये हैं उतारे। उन्हीं से बही सब जगह ज्ञान-धारा। उन्हीं से धरा पर धरम को पसारा।4। उन्हीं ने भली नीति की नींव डाली। खुली राह भलमंसियों की निकाली। उन्हीं ने नई पौधा नर की सँभाली। उन्हीं ने बनाया उसे बूझ वाली। उन्हीं ने उसे पाठ ऐसा पढ़ाया। कि है आज जिससे जगत जगमगाया।5। उन्हीं ने जगत-सभ्यता-जड़ जमाई। ...

हिरोशिमा की पीड़ा / अटल बिहारी वाजपेयी

हिरोशिमा की पीड़ा / अटल बिहारी वाजपेयी किसी रात को  मेरी नींद चानक उचट जाती है  आँख खुल जाती है  मैं सोचने लगता हूँ कि  जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का  आविष्कार किया था  वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण  नरसंहार के समाचार सुनकर  रात को कैसे सोए होंगे?  क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही  ये अनुभूति नहीं हुई कि  उनके हाथों जो कुछ हुआ  अच्छा नहीं हुआ!  यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा  किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें  कभी माफ़ नहीं करेगा!

पुनः चमकेगा दिनकर / अटल बिहारी वाजपेयी

पुनः चमकेगा दिनकर / अटल बिहारी वाजपेयी आज़ादी का दिन मना, नई ग़ुलामी बीच; सूखी धरती, सूना अंबर, मन-आंगन में कीच; मन-आंगम में कीच, कमल सारे मुरझाए; एक-एक कर बुझे दीप, अंधियारे छाए; कह क़ैदी कबिराय न अपना छोटा जी कर; चीर निशा का वक्ष पुनः चमकेगा दिनकर।

दुनिया का इतिहास पूछता / अटल बिहारी वाजपेयी

दुनिया का इतिहास पूछता / अटल बिहारी वाजपेयी दुनिया का इतिहास पूछता, रोम कहाँ, यूनान कहाँ? घर-घर में शुभ अग्नि जलाता। वह उन्नत ईरान कहाँ है? दीप बुझे पश्चिमी गगन के, व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा, किन्तु चीर कर तम की छाती, चमका हिन्दुस्तान हमारा। शत-शत आघातों को सहकर, जीवित हिन्दुस्तान हमारा। जग के मस्तक पर रोली सा, शोभित हिन्दुस्तान हमारा।