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अप्रैल 6, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चलनी के चालल दुलहा / भिखारी ठाकुर

चलनी के चालल दुलहा / भिखारी ठाकुर चलनी के चालल दुलहा, सूप के फटकारल हे,  दिअका के लागल बर, दुआरे बाजा बाजल हे। आँवा के पाकल दुलहा, झाँवा के झारल हे; कलछुल के दागल, बकलोलपुर के भागल हे। सासु का अँखिया में अन्हवट बा छावल हे; आइ कs देखऽ बर के पान चभुलावल हे। आम लेखा पाकल दुलहा, गाँव के निकालल हे; अइसन बकलोल बर चटक देवा का भावल हे। मउरी लगावल दुलहा, जामा पहिरावल हे; कहत ‘भिखारी’ हवन राम के बनावल हे।

पड़ोसी से / अटल बिहारी वाजपेयी

पड़ोसी से / अटल बिहारी वाजपेयी एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,  पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा। अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता,  अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।  त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता,  दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता। इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है ।  औरों के घर आग लगाने का जो सपना,  वो अपने ही घर में सदा खरा होता है। अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो,  अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ।  ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो,  आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ। पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है?  तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।  अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं,  माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई? अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को  दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।  दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से  तुम बच लोगे यह मत समझो। धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से  कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझ...

बहुत सँभाल के रक्खी तो पाएमाल हुई / दुष्यंत कुमार

बहुत सँभाल के रक्खी तो पाएमाल हुई / दुष्यंत कुमार बहुत सँभाल के रक्खी तो पाएमाल हुई सड़क पे फेंक दी तो ज़िंदगी निहाल हुई बड़ा लगाव है इस मोड़ को निगाहों से कि सबसे पहले यहीं रौशनी हलाल हुई कोई निजात की सूरत नहीं रही, न सही मगर निजात की कोशिश तो एक मिसाल हुई मेरे ज़ेह्न पे ज़माने का वो दबाब पड़ा जो एक स्लेट थी वो ज़िंदगी सवाल हुई समुद्र और उठा, और उठा, और उठा किसी के वास्ते ये चाँदनी वबाल हुई उन्हें पता भी नहीं है कि उनके पाँवों से वो ख़ूँ बहा है कि ये गर्द भी गुलाल हुई मेरी ज़ुबान से निकली तो सिर्फ़ नज़्म बनी तुम्हारे हाथ में आई तो एक मशाल हुई|

तुम मिले - माखनलाल चतुर्वेदी

तुम मिले / माखनलाल चतुर्वेदी तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई! भूलती-सी जवानी नई हो उठी, भूलती-सी कहानी नई हो उठी, जिस दिवस प्राण में नेह बंसी बजी, बालपन की रवानी नई हो उठी। किन्तु रसहीन सारे बरस रसभरे हो गए जब तुम्हारी छटा भा गई। तुम मिले,  प्राण  में रागिनी छा गई। घनों में मधुर स्वर्ण-रेखा मिली, नयन ने नयन रूप देखा, मिली- पुतलियों में डुबा कर नज़र की कलम नेह के पृष्ठ को चित्र-लेखा मिली; बीतते-से दिवस लौटकर आ गए बालपन ले जवानी संभल आ गई। तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई। तुम मिले तो प्रणय पर छटा छा गई, चुंबनों, सावंली-सी घटा छा गई, एक युग, एक दिन, एक पल, एक क्षण पर गगन से उतर चंचला आ गई। प्राण का दान दे, दान में प्राण ले अर्चना की अमर चाँदनी छा गई। तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई।