विद्यार्थी बिस्मिल की भावना / राम प्रसाद बिस्मिल
विद्यार्थी बिस्मिल की भावना राम प्रसाद बिस्मिल देश की ख़ातिर मेरी दुनिया में यह ताबीर [1] हो हाथ में हो हथकड़ी, पैरों पड़ी ज़ंजीर हो सर कटे, फाँसी मिले, या कोई भी तद्बीर [2] हो पेट में ख़ंजर दुधारा या जिगर में तीर हो आँख ख़ातिर तीर हो, मिलती गले शमशीर हो मौत की रक्खी हुई आगे मेरे तस्वीर हो मरके मेरी जान पर ज़ह्मत [3] बिला ताख़ीर [4] हो और गर्दन पर धरी जल्लाद ने शमशीर हो ख़ासकर मेरे लिए दोज़ख़ नया तामीर [5] हो अलग़रज़ [6] जो कुछ हो मुम्किन वो मेरी तहक़ीर [7] हो हो भयानक से भयानक भी मेरा आख़ीर हो देश की सेवा ही लेकिन इक मेरी तक़्सीर [8] हो इससे बढ़कर और भी दुनिया में कुछ ताज़ीर [9] हो मंज़ूर हो, मंज़ूर हो मंज़ूर हो, मंज़ूर हो मैं कहूँगा ’राम’ अपने देश का शैदा हूँ मैं फिर करूँगा काम दुनिया में अगर पैदा हूँ मैं शब्दार्थ: कष्ट की कल्पना पेशबन्दी क्लेश अविलम्ब निर्माण अधिक क्या कहूँ, किंबहुना दुर्दशा गुनाह, अपराध सज़ा, दण्ड, परिणाम