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नई क्रांति / गोपालप्रसाद व्यास

                नई क्रांति / गोपालप्रसाद व्यास कल मुझसे मेरी 'वे' बोलीं "क्योंजी, एक बात बताओगे?" "हाँ-हाँ, क्यों नहीं!" जरा मुझको इसका रहस्य समझाओगे? देखो, सन्‌ सत्तावन बीता, सब-कुछ ठंडा, सब-कुछ रीता, कहते थे लोग गदर होगा, आदमी पुनः बंदर होगा। पर मुन्ना तक भी डरा नहीं। एक चूहा तक भी मरा नहीं! पहले जैसी गद्दारी है, पहले-सी चोरबजारी है, दिन-दिन दूनी मक्कारी है, यह भ्रांति कहो कब जाएगी? अब क्रांति कहो कब आएगी? यह भी क्या पूछी बात, प्रिये! लाओ, कुछ आगे हाथ प्रिये! हाँ, शनि मंगल पर आया है, उसने ही प्रश्न सुझाया है। तो सुनो, तुम्हें समझाता हूँ, अक्कल का बटन दबाता हूँ, पर्दा जो पड़ा उठाता हूँ, हो गई क्रांति बतलाता हूँ। होगए मूर्ख विद्वान, प्रिये! गंजे बन गए महान प्रिये! दल्लाल लगे कविता करने, कवि लोग लगे पानी भरने, तिकड़म का ओपन गेट प्रिये! नेता से मुश्कल भेंट प्रिये! मंत्री का मोटा पेट, प्रिये! यह क्रांति नहीं तो क्या है जी? यह गदर नहीं तो क्या है जी? "लो लिख लो मेरी बातों को, क्रांति के नए उत्पातों को। अब नर...