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नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं / दुष्यंत कुमार

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं / दुष्यंत कुमार नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना ये गरम राख़ शरारों में ढल न जाए कहीं तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है चलो यहां से चलें, हाथ जल न जाए कहीं