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मार्च 21, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ख़ून की होली जो खेली

ख़ून की होली जो खेली युवकजनों की है जान ;    ख़ून की होली जो खेली । पाया है लोगों में मान,    ख़ून की होली जो खेली । रँग गये जैसे पलाश;    कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण,     ख़ून की होली जो खेली । निकले क्या कोंपल लाल,      फाग की आग लगी है, फागुन की टेढ़ी तान,      ख़ून की होली जो खेली । खुल गई गीतों की रात,       किरन उतरी है प्रात की ;- हाथ कुसुम-वरदान,    ख़ून की होली जो खेली । आई सुवेश बहार,    आम-लीची की मंजरी; कटहल की अरघान,     ख़ून की होली जो खेली । विकच हुए कचनार,     हार पड़े अमलतास के ; पाटल-होठों मुसकान,     ख़ून की होली जो खेली । सूर्यकांत त्रिपाठी निराला  यह कविता निराला जी ने 1946 के स्वाधीनता संग्राम में विद्यार्थियों के देश-प्रेम पर लिखी थी और यह गया से प्रकाशित साप्ताहिक...

यह कदम्ब का पेड़

यह कदम्ब का पेड़ यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।  मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।  ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।  किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।  तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।  उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।  वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।  अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।  बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।  माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।  तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।  ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।  तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।  और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।  तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।  जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।  इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।  यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।। सुभद्राकुमारी चौहान https://www.facebook.com/groups/backbencherzzzz/ ...

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

क्षण भर को क्यों प्यार किया था? अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर, पलक संपुटों में मदिरा भर तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था? क्षण भर को क्यों प्यार किया था? ‘यह अधिकार कहाँ से लाया?’ और न कुछ मैं कहने पाया - मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था! क्षण भर को क्यों प्यार किया था? वह क्षण अमर हुआ जीवन में, आज राग जो उठता मन में - यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था! क्षण भर को क्यों प्यार किया था? हरिवंशराय बच्चन