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अप्रैल 7, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली / दुष्यंत कुमार

देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली / दुष्यंत कुमार देख, दहलीज़ से काई नहीं जाने वाली ये ख़तरनाक  सच्चाई  नहीं जाने वाली  कितना अच्छा है कि साँसों की हवा लगती है आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली  एक तालाब-सी भर जाती है हर बारिश में मैं समझता हूँ ये खाई नहीं जाने वाली  चीख़ निकली तो है होंठों से मगर मद्धम है बंद कमरों को सुनाई नहीं जाने वाली  तू परेशान है, तू परेशान न हो इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई नहीं जाने वाली  आज सड़कों पे चले आओ तो दिल बहलेगा चन्द ग़ज़लों से तन्हाई नहीं जाने वाली

ख़ून फिर ख़ून है / साहिर लुधियानवी

ख़ून फिर ख़ून है / साहिर लुधियानवी ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा तुमने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा आज वह कूचा-ओ-बाज़ार में आ निकला है कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर ख़ून चलता है तो रूकता नहीं संगीनों से सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है जिस्म मिट जाने से इन्सान नहीं मर जाते धड़कनें रूकने से अरमान नहीं मर जाते साँस थम जाने से ऐलान नहीं मर जाते होंठ जम जाने से फ़रमान नहीं मर जाते जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ले आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक में हो कि मग़रिब में अमने आलम का ख़ून है आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर रूहे- तामीर ज़ख़्म खाती है खेत अपने जलें या औरों के ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है जंग तो ख़ुद हीं एक मअसला है जंग क्या मअसलों का हल देगी आग और खून आज बख़्शेगी भूख और अहतयाज कल देगी बरतरी के सुबूत की ख़ातिर खूँ बहाना हीं क्या जरूरी है घर की तारीकियाँ मिटाने को  घर जलाना हीं क्या जरूरी है टैंक आगे बढें कि पीछे हटें कोख धरती की बाँझ होती है...