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मई 1, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अपनी गंध नहीं बेचूंगा / बालकवि बैरागी

अपनी गंध नहीं बेचूंगा  बालकवि बैरागी    चाहे सभी सुमन बिक जाएं चाहे ये उपवन बिक जाएं चाहे सौ फागुन बिक जाएं पर मैं गंध नहीं बेचूंगा- अपनी गंध नहीं बेचूंगा जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें ओ मुझ पर मंडरानेवालों मेरा मोल लगानेवालों जो मेरा संस्कार बन गई वो सौगंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा-जाएगा दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझारों का रोना-धोना मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू-टोना ओ नीलम लगानेवालों पल-पल दाम बढानेवालों मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनुबंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मुझको मेरा अंत पता है पंखुरी-पंखुरी झर जाऊंगा लेकिन पहिले पवन-परी संग एक-एक के घर जाऊंगा भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी उस दिन ये मंडी समझेगी किसको कहते हैं खुद्दा...

बिस्मिल की अन्तिम रचना / राम प्रसाद बिस्मिल

बिस्मिल की अन्तिम रचना  राम प्रसाद बिस्मिल मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या ! दिल की बर्वादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या ! मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल , उस घड़ी गर नामावर लेकर पयाम आया तो क्या ! ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में , फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या ! काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते , यूँ सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या ! आख़िरी शब दीद के काबिल थी 'बिस्मिल' की तड़प , सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या !