काला धन / हरिओम पंवार मै अदना सा कलमकार हूँ घायल मन की आशा का मुझको कोई ज्ञान नहीं है छंदों की परिभाषा का जो यथार्थ में दीख रहा है मैं उसको लिख देता हूँ कोई निर्धन चीख रहा है मैं उसको लिख देता हूँ मैंने भूखों को रातों में तारे गिनते देखा है भूखे बच्चों को कचरे में खाना चुनते देखा है मेरा वंश निराला का है स्वाभिमान से जिन्दा हूँ निर्धनता और काले धन पर मन ही मन शर्मिंदा हूँ मैं शबनम चंदन के गीत नहीं गाता अभिनंदन वंदन के गीत नहीं गाता दरबारों के सत्य बताता फिरता हूँ काले धन के तथ्य बताता फिरता हूँ जहाँ हुकूमत का चाबुक कमजोर दिखाई देता है काले धन का मौसम आदमखोर दिखाई देता है। जिनके सर पर राजमुकुट है वो सरताज हमारे हैं, जो जनता से निर्वाचित हैं नेता आज हमारे हैं, इसीलिए अब दरबारों से केवल एक निवेदन है, काले धन का लेखा-जोखा देने का आवेदन है, क्योंकि भूख गरीबी का एक कारण काला धन भी है, फुटपाथों पर पली जिंदगी का हारा सा मन भी है, सिंहासन पर आने वालो अहंकार में मत झूलो, काले धन के साम्राज्य से आँख मिलाना मत भूलो, भूख प्यास का आलम देखो जाकर कालाहान्डी में, माँ बेटी को बेच रही है दिन की ए...