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जुलाई 1, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दुनिया का इतिहास पूछता / अटल बिहारी वाजपेयी

दुनिया का इतिहास पूछता / अटल बिहारी वाजपेयी दुनिया का इतिहास पूछता, रोम कहाँ, यूनान कहाँ? घर-घर में शुभ अग्नि जलाता। वह उन्नत ईरान कहाँ है? दीप बुझे पश्चिमी गगन के, व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा, किन्तु चीर कर तम की छाती, चमका हिन्दुस्तान हमारा। शत-शत आघातों को सहकर, जीवित हिन्दुस्तान हमारा। जग के मस्तक पर रोली सा, शोभित हिन्दुस्तान हमारा।

मरा हूँ हज़ार मरण / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

मरा हूँ हज़ार मरण / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" मरा हूँ हजार मरण पाई तब चरण-शरण । फैला जो तिमिर जाल कट-कटकर रहा काल, आँसुओं के अंशुमाल, पड़े अमित सिताभरण । जल-कलकल-नाद बढ़ा अन्तर्हित हर्ष कढ़ा, विश्व उसी को उमड़ा, हुए चारु-करण सरण ।

काला धन / हरिओम पंवार

काला धन / हरिओम पंवार मै अदना सा कलमकार हूँ घायल मन की आशा का मुझको कोई ज्ञान नहीं है छंदों की परिभाषा का जो यथार्थ में दीख रहा है मैं उसको लिख देता हूँ कोई निर्धन चीख रहा है मैं उसको लिख देता हूँ मैंने भूखों को रातों में तारे गिनते देखा है भूखे बच्चों को कचरे में खाना चुनते देखा है मेरा वंश निराला का है स्वाभिमान से जिन्दा हूँ निर्धनता और काले धन पर मन ही मन शर्मिंदा हूँ मैं शबनम चंदन के गीत नहीं गाता अभिनंदन वंदन के गीत नहीं गाता दरबारों के सत्य बताता फिरता हूँ काले धन के तथ्य बताता फिरता हूँ जहाँ हुकूमत का चाबुक कमजोर दिखाई देता है काले धन का मौसम आदमखोर दिखाई देता है। जिनके सर पर राजमुकुट है वो सरताज हमारे हैं, जो जनता से निर्वाचित हैं नेता आज हमारे हैं, इसीलिए अब दरबारों से केवल एक निवेदन है, काले धन का लेखा-जोखा देने का आवेदन है, क्योंकि भूख गरीबी का एक कारण काला धन भी है, फुटपाथों पर पली जिंदगी का हारा सा मन भी है, सिंहासन पर आने वालो अहंकार में मत झूलो, काले धन के साम्राज्य से आँख मिलाना मत भूलो, भूख प्यास का आलम देखो जाकर कालाहान्डी में, माँ बेटी को बेच रही है दिन की ए...