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मार्च 23, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

" बहरों को सुनाने के लिए जोरदार आवाज कि जरुरत पड़ती है।"

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" बहरों  को सुनाने के लिए जोरदार आवाज कि जरुरत पड़ती है।"    यह वाक्य भगत सिंह द्वारा असेंबली में बम फेंकने के बाद काफी  लोकप्रिय हुआ था । लेकिन आज भारत एक लोकतंत्र है ,और एक लोकतंत्र में बम  और गोलियों कि कोई जगह नहीं होती है । आजकल भारत में  वैसे बहरों कि संख्या काफी बढ़ गई है जो कि संसद में बैठ कर  देश के बारे में न सोचकर सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं और जो   देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं । और इन बहरों को  बाहर का रास्ता दिखलाने या इनके कानों तक तक देशभक्तों  कि आवाजों को पहुँचाने के लिए हम चुनाव नामक बम का हीं  उपयोग हम जोरदार आवाज करने के लिए कर सकतें हैं । और  अगर हमनें इन चुनावों में भी सही उम्मीदवारों को संसद नहीं  पहुँचा पातें हैं तो चुनाव नामक इन बमों के धमाकों कि गूँज हमें  अगले चुनावों तक सुनाई देगी और देश को न जेन कब तक ।  इसलिए हमें इस मौके का उपयोग देश को सही दिशा देने के  लिए करना चाहिए । तभी जाकर हम भगत सिंह , सुखदेव,  ...

शहीदों की चिताओं पर / जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’

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शहीदों की चिताओं पर /  जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’  उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा चखाएँगे मज़ा बर्बादिए गुलशन का गुलचीं को बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजरे क़ातिल पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़ न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’