अपनी गंध नहीं बेचूंगा / बालकवि बैरागी
अपनी गंध नहीं बेचूंगा बालकवि बैरागी चाहे सभी सुमन बिक जाएं चाहे ये उपवन बिक जाएं चाहे सौ फागुन बिक जाएं पर मैं गंध नहीं बेचूंगा- अपनी गंध नहीं बेचूंगा जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें ओ मुझ पर मंडरानेवालों मेरा मोल लगानेवालों जो मेरा संस्कार बन गई वो सौगंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा-जाएगा दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझारों का रोना-धोना मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू-टोना ओ नीलम लगानेवालों पल-पल दाम बढानेवालों मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनुबंध नहीं बेचूंगा अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं। मुझको मेरा अंत पता है पंखुरी-पंखुरी झर जाऊंगा लेकिन पहिले पवन-परी संग एक-एक के घर जाऊंगा भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी उस दिन ये मंडी समझेगी किसको कहते हैं खुद्दारी बिकने से बे...