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मैं हूँ अपराधी किस प्रकार / गोपालशरण सिंह

मैं हूँ अपराधी किस प्रकार / गोपालशरण सिंह मैं हूँ अपराधी किस प्रकार? सुन कर प्राणों के प्रेम – गीत, निज कंपित अधरों से सभीत। मैंने पूछा था एक बार, है कितना मुझसे तुम्हें प्यार? मैं हूँ अपराधी किस प्रकार? हो गये विश्व के नयन लाल, कंप गया धरातल भी विशाल। अधरों में मधु – प्रेमोपहार, कर लिया स्पर्श था एक बार। मैं हूँ अपराधी किस प्रकार? कर उठे गगन में मेघ धोष, जग ने भी मुझको दिया दोष। सपने में केवल एक बार, कर ली थी मैंने आँख चार। मैं हूँ अपराधी किस प्रकार?

अपने ही मन से कुछ बोलें / अटल बिहारी वाजपेयी

अपने ही मन से कुछ बोलें / अटल बिहारी वाजपेयी क्या खोया, क्या पाया जग में मिलते और बिछुड़ते मग में मुझे किसी से नहीं शिकायत यद्यपि छला गया पग-पग में एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें! पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी जीवन एक अनन्त कहानी पर तन की अपनी सीमाएँ यद्यपि सौ शरदों की वाणी इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें! जन्म-मरण अविरत फेरा जीवन बंजारों का डेरा आज यहाँ, कल कहाँ कूच है कौन जानता किधर सवेरा अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें! अपने ही मन से कुछ बोलें!