स्याह-सफ़ेद / जानकीवल्लभ शास्त्री
स्याह-सफ़ेद जानकीवल्लभ शास्त्री स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए ! मैं अपने में कोरा-सादा मेरा कोई नहीं इरादा ठोकर मर-मारकर तुमने बंजर उर में शूल उगाए । स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए ! मेरी निंदियारी आँखों का- कोई स्वप्न नहीं; पाँखों का- गहन गगन से रहा न नता, क्यों तुमने तारे तुड़वाए । स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए ! मेरी बर्फ़ीली आहों का बुझी धुआँती-सी चाहों का- क्या था? घर में आग लगाकर तुमने बाहर दिए जलाए ! स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए !