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स्याह-सफ़ेद / जानकीवल्लभ शास्त्री

स्याह-सफ़ेद  जानकीवल्लभ शास्त्री स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए ! मैं अपने में कोरा-सादा मेरा कोई नहीं इरादा ठोकर मर-मारकर तुमने बंजर उर में शूल उगाए । स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए ! मेरी निंदियारी आँखों का- कोई स्वप्न नहीं; पाँखों का- गहन गगन से रहा न नता, क्यों तुमने तारे तुड़वाए । स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए ! मेरी बर्फ़ीली आहों का बुझी धुआँती-सी चाहों का- क्या था? घर में आग लगाकर तुमने बाहर दिए जलाए ! स्याह-सफ़ेद डालकर साए मेरा रंग पूछने आए !

आग की भीख / रामधारी सिंह "दिनकर"

आग की भीख   रामधारी सिंह "दिनकर" धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,  कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।  कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;  मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?  दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,  बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।  प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।  चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।  बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,  कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?  मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?  यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?  आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,  भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।  तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।  ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।  आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,  बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,  अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,  है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।  निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।  निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।  पंचास्य...

कृष्ण की चेतावनी / रामधारी सिंह "दिनकर"

कृष्ण की चेतावनी  रामधारी सिंह "दिनकर" वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशिष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। ‘उदयाचल मेरा दीप्त ...