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उठो लाल अब आँखे खोलो / द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

उठो लाल अब आँखे खोलो  द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी उठो लाल अब आँखे खोलो  पानी लाई हूँ मुँह धो लो बीती रात कमल दल फूले  उनके ऊपर भंवरे डोले  चिड़िया चहक उठी पेड़ पर  बहने लगी हवा अति सुंदर  नभ में न्यारी लाली छाई  धरती ने प्यारी छवि पाई  भोर हुआ सूरज उग आया  जल में पड़ी सुनहरी छाया  ऐसा सुंदर समय न खोओ  मेरे प्यारे अब मत सोओ

अब वक़्त जो आने वाला है किस तरह गुज़रने वाला है / शहरयार

अब वक़्त जो आने वाला है किस तरह गुज़रने वाला है   शहरयार अब वक़्त जो आने वाला है किस तरह गुज़रनेवाला है वो शक्ल तो कब से ओझल है ये ज़ख़्म भी भरनेवाला है   दुनिया से बग़ावत करने की उस शख़्स से उम्मीदें कैसी दुनिया के लिए जो ज़िन्दा है दुनिया से जो डरने वाला है   आदम की तरह आदम से मिले कुछ अच्छे-सच्चे काम करे ये इल्म अगर हो इंसाँ को कब कैसे मरने वाला है   दरिया के किनारे पर इतनी ये भीड़ यही सुनकर आई इक चाँद बिना पैराहन के पानी में उतरने वाला है