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द्वन्द्वगीत / रामधारी सिंह "दिनकर"

द्वन्द्वगीत  रामधारी सिंह "दिनकर"  हम पर्वत पर की पुकार हैं, वे घाटी के वासी हैं; वन में ही वे गृही और  हम गृह में भी संन्यासी हैं। वे लेते कर बन्द खिड़कियाँ डर कर तेज हवाओं से; झंझाओं में पंख खोल उड़ने के हम अभ्यासी हैं।

द्वन्द्वगीत / रामधारी सिंह "दिनकर"

द्वन्द्वगीत  रामधारी सिंह "दिनकर"  चाहे जो भी फसल उगा ले, तू जलधार बहाता चल। जिसका भी घर चमक उठे, तू मुक्त प्रकाश लुटाता चल। रोक नहीं अपने अन्तर का वेग किसी आशंका से, मन में उठें भाव जो, उनको गीत बना कर गाता चल।

नमन करूँ मैं / रामधारी सिंह "दिनकर"

नमन करूँ मैं  रामधारी सिंह "दिनकर" तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?  मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?  किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं ? भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?  नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ? भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है,  मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है। जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ? भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है, एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है । जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है,  देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है । निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं ? खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से,  पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से,  तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है,  दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है। मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं ?  दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे ...