संदेश

अप्रैल 3, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रोटी और स्वाधीनता / रामधारी सिंह "दिनकर"

रोटी और स्वाधीनता / रामधारी सिंह "दिनकर" आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ? मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ? आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं, पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं। हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले,  पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले। इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ? है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ? झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ? आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ? है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी,  बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया / मुनव्वर राना

आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया / मुनव्वर राना आँखों को इंतज़ार की भट्टी पे रख दिया मैंने दिये को आँधी की मर्ज़ी पे रख दिया आओ तुम्हें दिखाते हैं अंजामे-ज़िंदगी सिक्का ये कह के रेल की पटरी पे रख दिया फिर भी न दूर हो सकी आँखों से बेवगी मेंहदी ने सारा ख़ून हथेली पे रख दिया दुनिया क्या ख़बर इसे कहते हैं शायरी मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया अंदर की टूट -फूट छिपाने के वास्ते जलते हुए चराग़ को खिड़की पे रख दिया घर की ज़रूरतों के लिए अपनी उम्र को बच्चे ने कारख़ाने की चिमनी पे रख दिया पिछला निशान जलने का मौजूद था तो फिर क्यों हमने हाथ जलते अँगीठी पे रख दिया

अमर राष्ट्र / माखनलाल चतुर्वेदी

अमर राष्ट्र / माखनलाल चतुर्वेदी छोड़ चले, ले तेरी कुटिया, यह लुटिया-डोरी ले अपनी, फिर वह पापड़ नहीं बेलने; फिर वह माल पडे न जपनी। यह जागृति तेरी तू ले-ले, मुझको मेरा दे-दे सपना, तेरे शीतल सिंहासन से सुखकर सौ युग ज्वाला तपना। सूली का पथ ही सीखा हूँ, सुविधा सदा बचाता आया, मैं बलि-पथ का अंगारा हूँ, जीवन-ज्वाल जलाता आया। एक फूँक, मेरा अभिमत है, फूँक चलूँ जिससे नभ जल थल, मैं तो हूँ बलि-धारा-पन्थी, फेंक चुका कब का गंगाजल। इस चढ़ाव पर चढ़ न सकोगे, इस उतार से जा न सकोगे, तो तुम मरने का घर ढूँढ़ो, जीवन-पथ अपना न सकोगे। श्वेत केश?- भाई होने को- हैं ये श्वेत पुतलियाँ बाकी, आया था इस घर एकाकी, जाने दो मुझको एकाकी। अपना कृपा-दान एकत्रित कर लो, उससे जी बहला लें, युग की होली माँग रही है, लाओ उसमें आग लगा दें। मत बोलो वे रस की बातें, रस उसका जिसकी तस्र्णाई, रस उसका जिसने सिर सौंपा, आगी लगा भभूत रमायी। जिस रस में कीड़े पड़ते हों, उस रस पर विष हँस-हँस डालो; आओ गले लगो, ऐ साजन! रेतो तीर, कमान सँभालो। हाय, राष्ट्र-मन्दिर में जाकर, तुमने पत्थर का प्रभू खो...