संदेश

जुलाई 6, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काफ़िला तो चले / कैफ़ी आज़मी

काफ़िला तो चले   कैफ़ी आज़मी ख़ारो-ख़स [1]  तो उठें, रास्ता तो चले मैं अगर थक गया, काफ़िला तो चले चाँद-सूरज बुजुर्गों के नक़्शे-क़दम ख़ैर बुझने दो इनको, हवा तो चले हाकिमे-शहर, ये भी कोई शहर है मस्जिदें बन्द हैं, मयकदा तो चले इसको मज़हब कहो या सियासत कहो ख़ुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊँगा आज ईंटों की हुरमत [2]  बचा तो चले बेलचे लाओ, खोलो ज़मीं की तहें मैं कहाँ दफ़्न हूँ, कुछ पता तो चले शब्दार्थ:   झाड़-झंखाड़   मर्यादा

चरागों का लगा मेला ये झांकी खूबसूरत है / प्रदीप

चरागों का लगा मेला ये झांकी खूबसूरत है   प्रदीप चरागों का लगा मेला ये झांकी खूबसूरत है मगर वो रौशनी है कहाँ मुझे जिसकी जरुरत है ये ख़ुशी लेके मैं क्या करूँ मेरी है अब तलक रात काली जगमगाते दियो मत जलो मुझसे रूठी है मेरी दिवाली ये ख़ुशी लेके मैं क्या करूँ जिनसे रोशन थी ये ज़िन्दगी वो तो जाने कहीं चल दिए रौशनी मेरे आकाश को देने वाले कहीं चल दिए चल दिए है मेरे देवता जिनका मंजर पड़ा आज खाली जगमगाते दियो मत जलो मुझसे रूठी है मेरी दिवाली मैं जितना आज हूँ उतना ना था उदास कभी चले गए वो बड़ी दूर जो थे पास कभी अनाथ कर गए मुझको बिसारने वाले बिना बताये अचानक सिधारने वाले कहा हो ऐ मेरी बिगड़ी सँवारने वालों  पुकार लो मुझे बेटा पुकारने वालों