संदेश

जुलाई 30, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सत्य तो बहुत मिले / अज्ञेय

सत्य तो बहुत मिले  अज्ञेय खोज़ में जब निकल ही आया  सत्य तो बहुत मिले ।  कुछ नये कुछ पुराने मिले  कुछ अपने कुछ बिराने मिले  कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले  कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले  कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले  कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।  कुछ ने लुभाया  कुछ ने डराया  कुछ ने परचाया-  कुछ ने भरमाया-  सत्य तो बहुत मिले  खोज़ में जब निकल ही आया ।  कुछ पड़े मिले  कुछ खड़े मिले  कुछ झड़े मिले  कुछ सड़े मिले  कुछ निखरे कुछ बिखरे  कुछ धुँधले कुछ सुथरे  सब सत्य रहे  कहे, अनकहे ।  खोज़ में जब निकल ही आया  सत्य तो बहुत मिले  पर तुम  नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम  मोम के तुम, पत्थर के तुम  तुम किसी देवता से नहीं निकले:  तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले  मेरे ही रक्त पर पले  अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती  मेरी अशमित चिता पर  तुम मेरे ही साथ जले ।  तुम-  तुम्हें तो  भस्म हो  मैंने फिर अपनी भभूत में पाया...