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अगस्त 31, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वफ़ा को आज़माना चाहिए था / राहत इन्दौरी

वफ़ा को आज़माना चाहिए था / राहत इन्दौरी वफ़ा को आज़माना चाहिए था, हमारा दिल दुखाना चाहिए था आना न आना मेरी मर्ज़ी है, तुमको तो बुलाना चाहिए था हमारी ख्वाहिश एक घर की थी, उसे सारा ज़माना चाहिए था मेरी आँखें कहाँ नम हुई थीं, समुन्दर को बहाना चाहिए था जहाँ पर पंहुचना मैं चाहता हूँ, वहां पे पंहुच जाना चाहिए था हमारा ज़ख्म पुराना बहुत है, चरागर भी पुराना चाहिए था मुझसे पहले वो किसी और की थी, मगर कुछ शायराना चाहिए था चलो माना ये छोटी बात है, पर तुम्हें सब कुछ बताना चाहिए था तेरा भी शहर में कोई नहीं था, मुझे भी एक ठिकाना चाहिए था कि किस को किस तरह से भूलते हैं, तुम्हें मुझको सिखाना चाहिए था ऐसा लगता है लहू में हमको, कलम को भी डुबाना चाहिए था अब मेरे साथ रह के तंज़ ना कर, तुझे जाना था जाना चाहिए था क्या बस मैंने ही की है बेवफाई,जो भी सच है बताना चाहिए था मेरी बर्बादी पे वो चाहता है, मुझे भी मुस्कुराना चाहिए था बस एक तू ही मेरे साथ में है, तुझे भी रूठ जाना चाहिए था हमारे पास जो ये फन है मियां, हमें इस से कमाना चाहिए था अब ये ताज किस काम का है, हमें सर को बचाना चा...

चांदनी छत पे चल रही होगी / दुष्यंत कुमार

चांदनी छत पे चल रही होगी / दुष्यंत कुमार चांदनी छत पे चल रही होगी अब अकेली टहल रही होगी फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी | कल का सपना बहुत सुहाना था ये उदासी न कल रही होगी सोचता हूँ कि बंद कमरे में एक शमअ-सी जल रही होगी | तेरे गहनों सी खनखनाती थी बाजरे की फ़सल रही होगी जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी |

मरना लगा रहेगा यहाँ जी तो लीजिए / दुष्यंत कुमार

मरना लगा रहेगा यहाँ जी तो लीजिए / दुष्यंत कुमार मरना लगा रहेगा यहाँ जी तो लीजिए ऐसा भी क्या परहेज़, ज़रा—सी तो लीजिए अब रिन्द बच रहे हैं ज़रा तेज़ रक़्स हो महफ़िल से उठ लिए हैं नमाज़ी तो लीजिए पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए ख़ामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर कर दी है शहर भर में मुनादी तो लीजिए ये रौशनी का दर्द, ये सिरहन ,ये आरज़ू, ये चीज़ ज़िन्दगी में नहीं थी तो लीजिए फिरता है कैसे—कैसे सवालों के साथ वो उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए

खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही / दुष्यंत कुमार

खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही / दुष्यंत कुमार खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा या यूँ कहो कि बर्क़ की दहशत नहीं रही हमको पता नहीं था हमें अब पता चला इस मुल्क में हमारी हक़ूमत नहीं रही कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग रो-रो के बात कहने की आदत नहीं रही सीने में ज़िन्दगी के अलामात हैं अभी गो ज़िन्दगी की कोई ज़रूरत नहीं रही

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं / दुष्यंत कुमार

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं / दुष्यंत कुमार कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं  अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं  वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं  एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है जिसमें तहख़ानों में तहख़ाने लगे हैं  मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने उस तरफ़ जाने से क़तराने लगे हैं  मौलवी से डाँट खा कर अहले-मक़तब फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं  अब नई तहज़ीब के पेशे-नज़र हम आदमी को भूल कर खाने लगे हैं