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छोड़ द्रुमों की मृदु छाया

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया  छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,  बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को!  तज कर तरल तरंगों को, इन्द्रधनुष के रंगों को,  तेरे भ्रू भ्रंगों से कैसे बिधवा दूँ निज मृग सा मन? भूल अभी से इस जग को!  कोयल का वह कोमल बोल, मधुकर की वीणा अनमोल,  कह तब तेरे ही प्रिय स्वर से कैसे भर लूँ, सजनि, श्रवण? भूल अभी से इस जग को!  ऊषा-सस्मित किसलय-दल, सुधा-रश्मि से उतरा जल,  ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन? भूल अभी से इस जग को! सुमित्रानंदन पंत

वे किसान की नई बहू की आँखें

वे किसान की नई बहू की आँखें रचनाकार:  सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" नहीं जानती जो अपने को खिली हुई -- विश्व-विभव से मिली हुई -- नहीं जानती सम्राज्ञी अपने को -- नहीं कर सकीं सत्य कभी सपने को, वे किसान की नई बहू की आँखें ज्यों हरीतिमा में बैठे दो विहग बन्द कर पाँखें ; वे केवल निर्जन के दिशाकाश की, प्रियतम के प्राणों के पास-हास की, भीरु पकड़ जाने को हैं दुनिया के कर से -- बढ़े क्यों न वह पुलकित हो कैसे भी वर से ।