संदेश

अगस्त 10, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या किया आज तक क्या पाया? / हरिशंकर परसाई

क्या किया आज तक क्या पाया?  हरिशंकर परसाई मैं सोच रहा, सिर पर अपार दिन, मास, वर्ष का धरे भार पल, प्रतिपल का अंबार लगा आखिर पाया तो क्या पाया? जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा जब थाप पड़ी, पग डोल उठा औरों के स्वर में स्वर भर कर अब तक गाया तो क्या गाया? सब लुटा विश्व को रंक हुआ रीता तब मेरा अंक हुआ दाता से फिर याचक बनकर कण-कण पाया तो क्या पाया? जिस ओर उठी अंगुली जग की उस ओर मुड़ी गति भी पग की जग के अंचल से बंधा हुआ खिंचता आया तो क्या आया? जो वर्तमान ने उगल दिया उसको भविष्य ने निगल लिया है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु जूठन खाया तो क्या खाया?

हमारे वेद / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

हमारे वेद  अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ अभी नर जनम की बजी भी बधाई। रही आँख सुधा बुधा अभी खोल पाई। समझ बूझ थी जिन दिनों हाथ आई। रही जब उपज की झलक ही दिखाई। कहीं की अंधेरी न थी जब कि टूटी। न थी ज्ञान सूरज किरण जब कि फूटी।1। तभी एक न्यारी कला रंग लाई। हमारे बड़ों के उरों में समाई। दिखा पंथ पारस बनी काम आई। फबी और फूली फली जगमगाई। उसी से हुआ सब जगत में उँजाला। गया मूल सारे मतों का निकाला।2। हमारे बड़े ए बड़ी सूझ वाले। हुए हैं सभी बात ही में निराले। उन्होंने सभी ढंग सुन्दर निकाले। जगत में बिछे ज्ञान के बीज डाले। उन्हीं का अछूता वचन लोक न्यारा। गया वेद के नाम से है पुकारा।3। विचारों भरे वेद ए हैं हमारे। सराहे सभी भाव के हैं सहारे। बड़े दिव्य हैं, हैं बड़े पूत, न्यारे। मनो स्वर्ग से वे गये हैं उतारे। उन्हीं से बही सब जगह ज्ञान-धारा। उन्हीं से धरा पर धरम को पसारा।4। उन्हीं ने भली नीति की नींव डाली। खुली राह भलमंसियों की निकाली। उन्हीं ने नई पौधा नर की सँभाली। उन्हीं ने बनाया उसे बूझ वाली। उन्हीं ने उसे पाठ ऐसा पढ़ाया। कि है आज जिससे जगत जगमगाया।5। उन्हीं ने जगत-सभ्यता-जड़ जमाई। ...