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हालाते-जिस्म, सूरते—जाँ और भी ख़राब / दुष्यंत कुमार

हालाते-जिस्म, सूरते—जाँ और भी ख़राब / दुष्यंत कुमार हालाते जिस्म, सूरती—जाँ और भी ख़राब चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे होंठों पे आ रही है ज़ुबाँ और भी ख़राब पाबंद हो रही है रवायत से रौशनी चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब मूरत सँवारने से बिगड़ती चली गई पहले से हो गया है जहाँ और भी ख़राब रौशन हुए चराग तो आँखें नहीं रहीं अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब सोचा था उनके देश में मँहगी है ज़िंदगी पर ज़िंदगी का भाव वहाँ और भी ख़राब

आज सडकों पर / दुष्यंत कुमार

आज सडकों पर / दुष्यंत कुमार आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख, पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख । एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख । अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह, यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख । वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे, कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख । ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है, रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख । राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई,  राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।