शांति रहे पर क्रांति रहे ! / गोपालशरण सिंह
शांति रहे पर क्रांति रहे ! / गोपालशरण सिंह फूल हँसें खेलें नित फूलें, पवन दोल पर सुख से झूलें किन्तु शूल को कभी न भूलें, स्थिरता आती है जीवन में यदि कुछ नहीं अशान्ति रहे शांति रहे पर क्रांति रहे ! यदि निदाघ क्षिति को न तपावे, तो क्या फिर घन जल बरसावे ? कैसे जीवन जग में आवे ? यदि न बदलती रहे जगत में, तो किसको प्रिय कांति रहे ? शांति रहे पर कांति रहे ! उन्नति हो अथवा अवनति हो , यदि निश्चित मनुष्य की गति हो , तो फिर किसे क्रम में रति हो ? रहे अतल विश्वास चित्त में , किन्तु तनिक सी भ्रान्ति रहे शांति रहे पर क्राँति रहे ?