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शांति रहे पर क्रांति रहे ! / गोपालशरण सिंह

शांति रहे पर क्रांति रहे ! / गोपालशरण सिंह फूल हँसें खेलें नित फूलें, पवन दोल पर सुख से झूलें  किन्तु शूल को कभी न भूलें, स्थिरता आती है जीवन में  यदि कुछ नहीं अशान्ति रहे  शांति रहे पर क्रांति रहे ! यदि निदाघ क्षिति को न तपावे, तो क्या फिर घन जल बरसावे ? कैसे जीवन जग में आवे ? यदि न बदलती रहे जगत में, तो किसको प्रिय कांति रहे ? शांति रहे पर कांति रहे ! उन्नति हो अथवा अवनति हो , यदि निश्चित मनुष्य की गति हो , तो फिर किसे क्रम में रति हो ? रहे अतल विश्वास चित्त में , किन्तु तनिक सी भ्रान्ति रहे  शांति रहे पर क्राँति रहे ?

गुलामी मिटा दो / राम प्रसाद बिस्मिल

गुलामी मिटा दो / राम प्रसाद बिस्मिल दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा, एक बार ज़माने को आज़ाद बना दूंगा। बेचारे ग़रीबों से नफ़रत है जिन्हें, एक दिन, मैं उनकी अमरी को मिट्टी में मिला दूंगा। यह फ़ज़ले-इलाही से आया है ज़माना वह, दुनिया की दग़ाबाज़ी दुनिया से उठा दूंगा। ऐ प्यारे ग़रीबो! घबराओ नहीं दिल में, हक़ तुमको तुम्हारे, मैं दो दिन में दिला दूंगा। बंदे हैं ख़ुदा के सब, हम सब ही बराबर हैं, ज़र और मुफ़लिसी का झगड़ा ही मिटा दूंगा। जो लोग ग़रीबों पर करते हैं सितम नाहक़, गर दम है मेरा क़ायम, गिन-गिन के सज़ा दूंगा। हिम्मत को ज़रा बांधो, डरते हो ग़रीबों क्यों? शैतानी क़िले में अब मैं आग लगा दूंगा। ऐ ‘सरयू’ यक़ीं रखना, है मेरा सुख़न सच्चा, कहता हूं, जुबां से जो, अब करके दिखा दूंगा।