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सब जीवन बीता जाता है / जयशंकर प्रसाद

सब जीवन बीता जाता है /  जयशंकर प्रसाद सब जीवन बीता जाता है धूप छाँह के खेल सदॄश सब जीवन बीता जाता है| समय भागता है प्रतिक्षण में, नव-अतीत के तुषार-कण में, हमें लगा कर भविष्य-रण में, आप कहाँ छिप जाता है सब जीवन बीता जाता है| बुल्ले, नहर, हवा के झोंके, मेघ और बिजली के टोंके, किसका साहस है कुछ रोके, जीवन का वह नाता है सब जीवन बीता जाता है| वंशी को बस बज जाने दो, मीठी मीड़ों को आने दो, आँख बंद करके गाने दो जो कुछ हमको आता है सब जीवन बीता जाता है।

लहर / जयशंकर प्रसाद

लहर /  जयशंकर प्रसाद वे कुछ दिन कितने सुंदर थे ? जब सावन घन सघन बरसते इन आँखों की छाया भर थे  सुरधनु रंजित नवजलधर से- भरे क्षितिज व्यापी अंबर से मिले चूमते जब सरिता के हरित कूल युग मधुर अधर थे  प्राण पपीहे के स्वर वाली बरस रही थी जब हरियाली रस जलकन मालती मुकुल से जो मदमाते गंध विधुर थे  चित्र खींचती थी जब चपला नील मेघ पट पर वह विरला मेरी जीवन स्मृति के जिसमें खिल उठते वे रूप मधुर थे