द्वन्द्वगीत / रामधारी सिंह "दिनकर"

द्वन्द्वगीत 

रामधारी सिंह "दिनकर" 


चाहे जो भी फसल उगा ले,
तू जलधार बहाता चल।
जिसका भी घर चमक उठे,
तू मुक्त प्रकाश लुटाता चल।
रोक नहीं अपने अन्तर का
वेग किसी आशंका से,
मन में उठें भाव जो, उनको
गीत बना कर गाता चल।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

धरती का आँगन इठलाता / सुमित्रानंदन पंत

उठो लाल अब आँखे खोलो / द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

कलम या कि तलवार / रामधारी सिंह "दिनकर"